जन्म कुंडली में किसी घटना के होने में दशाओं के साथ गोचर के ग्रहों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। यदि जन्म कुंडली में दशा अनुकूल भावों की चल रही है लेकिन ग्रहों का गोचर अनुकूल नहीं है तब व्यक्ति को संबंधित भाव के फल नहीं मिल पाते हैं।  इसलिए किसी भी घटना के लिए दशा के साथ गोच़र भी अनिवार्य माना गया है। यदि गोचर अनुकूल है लेकिन दशा अनुकूल नही है तब भी फलों की प्राप्ति नहीं हो पाती है।  गोचर से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में आपको जानकारी देने का प्रयास इस लेख के माध्यम से किया जाएगा। जब जन्म कालीन सूर्य के ऊपर से शनि का गोचर होता है तब उस भाव के कारकत्वों से संबंधित फलों में कठिनाई का अनुभव व्यक्ति विशेष को होता है। जब जन्मकालीन सूर्य पर से बृहस्पति का गोचर होता है या उसकी दृश्टि पड़ रही होती है तब व्यक्ति को आजीविका में पदोन्नति मिलती है. वह अपनी आजीविका में वृद्धि भी पाता है और विकास की ओर बढ़ता है।
जन्मकालीन बुध पर से बृहस्पति का गोचर या दृष्टि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में सुधार करती है।
कुंडली के दूसरे या ग्यारहवें भाव पर गुरु की दृष्टि अथवा गोचर व्यक्ति विशेष को आर्थिक रुप से संपन्न बनाता है।
जन्मकालीन शुक्र के ऊपर से बृहस्पति का गोचर अथवा दृष्टि प्रेम संबंध स्थापित कराती है।
जन्मकालीन शुक्र के ऊपर से बृहस्पति का गोचर व्यक्ति को विवाह देता है।
कुंडली में जिस भाव से संबंधित दशा या अन्तर्दशा चलती है उस भाव में बृहस्पति का गोचर या दृष्टि शुभ फल प्रदान करती है।
जन्मकालीन बृहस्पति पर से बृहस्पति का गोचर संतान का जन्म देता है।
जन्म कुंडली के सूर्य को यदि गोचर के शनि व बृहस्पति एक साथ प्रभावित करें तब व्यक्ति की पदोन्नति वेतन में वृद्धि के साथ होती है लेकिन साथ ही व्यक्ति को स्थानांतरण भी देती है।
चतुर्थ भाव पर यदि गोचर के शनि व बृहस्पति एक साथ प्रभाव डालें तब व्यक्ति का निवास स्थान बदल जाता है।
जन्म कुंडली के सप्तम भाव पर बृहस्पति व शनि का एक साथ प्रभाव पड़ने पर व्यक्ति का विवाह संपन्न होता है।
जन्म कुंडली के पंचम भाव/पंचमेश पर जब गोचर के शनि व बृहस्पति एक साथ प्रभाव डालते हैं तब व्यक्ति का विवाह तय होता है या विवाह हो जाता है या विवाह की ओर व्यक्ति का रुझान होता है।
कुंडली के छठे, आठवें व बारहवें भाव के अंशों को जोड़ने पर प्राप्त अंश पर या उससे त्रिकोण पर शनि का गोचर मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट देता है।
जन्मकालीन अष्टमेश पर या उससे त्रिकोण भाव में चंद्रमा का गोचर अशुभ परिणाम देता है।
एक अशुभ स्थान में किसी ग्रह का गोचर किसी तरह की कोई हानि नहीं पहुंचाएंगे यदि वह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में स्थित होता है।
यदि व्यक्ति विशेष की जन्म कुंडली में दशा/अन्तर्दशा अनुकूल हो लेकिन उस समय गोचर प्रतिकूल चल रहा हो तब दशा के अनुकूल फल सम हो जाते हैं।  अनुकूल परिणामो का फल अनुभव नही किया जा सकता है।
गोचर के शुभ फल तभी प्राप्त होगें जब कुंडली में दशा/अन्तर्दशा व गोचर दोनो ही अनुकूल चल रहे हों।
जन्मकालीन शुक्र, बुध और सूर्य पर से राहु का गोचर व्यक्ति के जीवन को तरक्की की ओर ले जाता है।
जन्मकालीन मंगल के ऊपर से शनि का गोचर व्यक्ति के जीवन में एक विशिष्ट परिवर्तन लेकर आता है।
दशमेश पर से शनि का गोचर व्यवसाय संबंधी गंभीर समस्याएँ प्रदान करता है।
आठवें भाव में शनि का गोचर अत्यधिक चिन्ताएँ प्रदान करता है और इसी तरह से शनि की साढ़ेसाती भी व्यक्ति को मानसिक चिन्ताएँ व परेशानियाँ प्रदान करती हैं।
जन्मकालीन चंद्रमा या चंद्रमा से चतुर्थ या आठवें भाव पर से मंगल का गोचर व्यक्ति को रोग प्रदान करता है।
चंद्रमा से दशम भाव में शनि का गोचर व्यक्ति को यात्राएँ करवाता है और उसका स्थान परिवर्तन भी कराता है।
कुंडली में गोचर के वक्री ग्रहो की दृष्टि एक भाव पीछे से भी मानी जाती है।  उदाहरण के लिए वक्री शनि का गोचर तुला राशि में हो रहा है तब शनि का प्रभाव कन्या राशि से माना जाएगा।
जन्म कुंडली में जब किसी एक भाव/भावेश पर से शनि व बृहस्पति का गोचर एक साथ असर डालता है तब उस भाव से संबंधित फलों की प्राप्ति होती है।
कुंडली में जिस ग्रह की दशा/अन्तर्दशा चल रही होती है यदि वह ग्रह गोचर में अपनी नीच राशि में गोचर करता है तब व्यक्ति को परेशानियाँ व बाधाएँ प्रदान करेगा।