दिलबल ग्रह अपनी दिशा स्वामित्व के अनुसार बलवान होता है। जो भी ग्रह दिग्बली होता है उसे जिस भी राशि में जितना बल मिलता है उससे ज्यादा बल उस ग्रह को मिलता है जिसे दिग्बली या दिशाबली ग्रह कहते है।इसके विपरीत जो ग्रह अपनी स्वामित्व की ठीक सामने वाली दिशा में होते है वह दिग्बल या दिशाबल हीन ग्रह होते है।दसो दिशाओ में कुंडली का पहला भाव पूर्व दिशा, चौथा भाव उत्तर दिशा, सातवाँ भाव पश्चिम दिशा और दसवाँ भाव दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। गुरु, बुध यह पहले भाव(पूर्व दिशा) में दिग्बली प्राप्त करते है तो ठीक सामने वाले भाव और दिशा सातवे भाव(पश्चिम दिशा) में दिग्बल से हीन हो जाते है। चंद्र, शुक्र चौथे भाव में(उत्तर दिशा) में दिग्बली होते है तो ठीक सामने वाले भाव दसवे भाव(दक्षिण दिशा) में दिग्बल से हीन हो जाते है। शनि कुंडली के सातवे भाव(पश्चिम दिशा)में दिग्बली होता है और प्रथम भाव(पूर्व दिशा) में दिग्बल से हीन हो जाता है। सूर्य, मंगल यह दशम भाव(दक्षिण दिशा) में दिग्बली होते है और ठीक सामने वाले भाव चौथे भाव(उत्तर दिशा) में दिग्बल से हीन हो जाते है। राहु और केतु किसी भी भाव या दिशा में दिग्बली नही होते है। यदि यह दिग्बली ग्रह के साथ होते है तब उस दिग्बली ग्रह का कुछ दिग्बल राहु, केतु को मिलता है। इस तरह दिग्बली ग्रह दिशा बल से बली होता है तो दिग्बल हीन ग्रह दिशा बल से कमजोर होता है। विशेष तौर पर दिग्बली ग्रह जब योगकारक हो तब दिग्बल से हीन होने पर ऐसे ग्रह का रत्न, धातु, जड़, मन्त्र जप करके उसका बली बनाया जा सकता है।