इस लग्न का स्वामी गुरु है तथा यह लग्न गुरु-शनि और बुध के किसी एक के नक्षत्र में समाहित होती है.
गुरु दशम का भी स्वामी होता है लेकिन लग्नेश होने से इसे केन्द्रीय दोष नहीं लगता है बल्कि इस लग्न का गुरु बहुत ही मंगलकारी होता है.
इस लग्न में गुरु की द्शान्तर बहुत अच्छी होती है इसकी दशा में मान-सम्मान और सरकारी धन एवं लाभ तथा व्यावसायिक उन्नति होती है.मंगल की अन्तर्दशा सफलता देता है.यदि गुरु व म्नाग्ल की युति,दृष्टी अथवा केन्द्रीय योग हो तो जीवन का यह समय बहुत उत्तम व यादगार का होता है.
सूर्य की दशा में व्यक्ति अस्वस्थ होता है ऐसा सूर्य जिस ग्रह के साथ होगा उससे सम्बन्धित बीमारियाँ देता है जैसेकि... बुध के साथ चर्म रोग,लकवा,स्मरण शक्ति का ह्रास होता है.जबकि अकेला सूर्य अष्टम में होने से राजयोगी हो जाता है.
चन्द्रमा चूँकि पंचमेश होता है इस लग्न में.इसकी दशा में नए नायर कार्य व योजनायें फलीभूत होती हैं.मन प्रसन्न रहता है.सन्तान का सुख प्राप्त होता है बशर्ते चन्द्रमा 8 में न हो.
मंगल 2-9 का स्वामी है इस लग्न में ये दोनों ही भाव समृद्धि से सम्बन्धित हैं.2 रा भाव मारक है लेकिन ऐसा मंगल मारक का काम नहीं करता है इस लग्न में.मंगल यदि बलवान है तो अच्छा भाग्य व धनदायक बनता है.
बुध इस लग्न का बाधक व मारक है.इसका कमजोर होना ही इस लग्न के लिए शुभ है.अन्यथा सफलता में रोड़े अटकाता है.
शुक्र मीन लग्न के लिए बहुत ही अनिष्टकारी होता है.शनि में इसका अंतर अथवा इसमें शनि का अन्तर भिकारी बना देता है.यह हर तरह से कष्टदायी है.
शनि इस लग्न का लाभेश व व्यवेश है.गोचरीय स्तिथि में यदि यह अच्छा है तो ठीक है अन्यथा यह बहुत ही अनिष्टकारी है.इस लग्न में साढ़ेसाती तथा अष्टम बहुत ही कष्टकारी होता है.हालांकि इसके लिए भिन्नाष्टक को देख लेना चाहिए तभी इसकी भयानकता का पता चल पायेगा।
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