बृहस्पति को 2, 5, 9, 10 और 11वें भाव का स्थिर कारक माना गया है। आमतौर से अपने ही भाव में कारक को अच्छा नहीं माना गया है परंतु दूसरे भाव में बृहस्पति को लाभ देने वाला माना गया है।

प्रत्येक लग्र के लिए बृहस्पति का शुभ-अशुभ --

मेष लग्न में बृहस्पति योगकारक हैं। वृषभ व मिथुन लग्न के लिए पाप फल देते हैं। कर्क, सिंह लग्न के लिए बृहस्पति शुभ फलदायी हैं परंतु कन्या और तुला लग्न के लिए अशुभ फलदायी होते हैं।

वृश्चिक लग्न के लिए बृहस्पति शुभफल देने वाले, धनु लग्न के लिए सम, मकर और कुंभ लग्न के लिए पाप फल देने वाले और मीन लग्न के लिए शुभफल माने गए हैं।

बृहस्पति जन्मपत्रिका में जब वक्री होते हैं तब अत्यंत शक्तिशाली परिणाम देते हैं। आमतौर से बृहस्पति अपनी सोलह वर्ष की दशा भोगने के बाद ही पूरे परिणाम देते हैं और जिस भाव के अधिपति होते हैं उसका तो निश्चित परिणाम देते हैं। जिस भाव पर इनकी दृष्टि हो, उस भाव के भी शुभ परिणाम देेते हैं। दैनिक भ्रमण में भी बृहस्पति जिस-जिस भाव पर दृष्टि करते हुए चलते हैं उस भाव के शुभ परिणामों में वृद्धि हो जाती है। जिस भाव के स्वामी के साथ बृहस्पति युति कर रहें हो तो उस भाव के स्वामी के भी शुभफल आना शुरु हो जाते हैं।
बृहस्पति अस्त होते हैं तो अशुभ परिणाम देते हैं। जन्मपत्रिका में अस्त होने से शरीर में वसा संबंधी विकृतियां आती हैं और आमतौर से पेट और लीवर इत्यादि प्रभावी होते हैं। बृहस्पति जब आकाश में अस्त चल रहे होते हैं तो मुहूर्त नहीं निकाले जाते। मूल जन्मपत्रिका में भी यदि बृहस्पति अस्त हो गए हों तो विवाह में शुभ नहीं माने जाते हैं। कन्याओं की जन्मपत्रिकाओं में बृहस्पति को विवाह का कारक माना जाता है और इनका अस्त होना अच्छा नहीं माना जाता। मंगल और बृहस्पति का जन्मपत्रिका में परस्पर संबंध भी शुभ नहीं माना जाता।
बृहस्पति जिस भाव में बैठे होते हैं उसी भाव की चिंता कराते हैं। सप्तम भाव में स्थित बृहस्पति विवाह के लिए शुभ नहीं माने जाते हैं। या तो यह विवाह होने नहीं देते या विवाह को टिकने नहीं देते। पंचम भाव में स्थित बृहस्पति अधिकांश राशियों में कन्या अधिक देते हैं और पुत्र कम देते हैं।
यदि बृहस्पति जन्मपत्रिका में अस्त या वक्री हों तो मोटापे से संबंधित दोष आते हैं और पाचन तंत्र के विकार परेशान करते हैं। जब-जब गोचर में बृहस्पति लग्न, लग्नेश तथा चंद्र लग्न को देखते हैं तो वजन बढऩे लगता है क्योंकि खानपान का स्तर उच्चकोटि का रहता है। बृहस्पति जब-जब बलवान होंगे, गरिष्ठ भोजन करने को मिलेगा और सभाओं में और दावत में जाने का अवसर मिलता रहेगा।
बृहस्पति अपनी दशाओं में व्यक्ति को लेखक बनाते हैं, धार्मिक बनाते हैं, व्यक्ति की प्रसिद्धि कराते हैं और लोग व्यक्ति से सलाह लेने आते हैं। व्यक्ति की मित्रता राज्य के अधिकारियों से होती है और वह बड़े लोगों की संगत में बैठता है। बृहस्पति ज्ञान में वृद्धि करते हैं, यज्ञ-हवन कराते हैं और शरीर व मस्तिष्क पर तेज आता है। यदि जन्मकाल में बृहस्पति केन्द्र में उच्च या स्वराशि में होकर बैठ जाएं तो हंसयोग बनाते हैं जिसमें व्यक्ति महान होता चला जाता है। यदि चंद्रमा से केन्द्र में बृहस्पति हों तो गजकेसरी योग बनता है जिसके प्रभाव में व्यक्ति समाज में ऊंचा उठता हुआ चला जाता है। हंसयोग में जन्मे व्यक्ति के हाथ व पैरों में शंख, कमल आदि के चिन्ह मिलते हैं। सौम्य शरीर होता है, उत्तम भोजन करने वाला होता है और लोग उसकी प्रशंसा करते हैं।

बृहस्पति के बारे में कुछ विशेष —–

यदि नीच राशि के हों, अस्तंगत हों, लग्न से 6, 8, 12 में हों, शनि, मंगल से दृष्ट हों या युत हों तो अपने करीबी लोगों से और सरकार से कलह होती है, चोर से कष्ट होता है, माता-पिता के लिए हानिकारक है, मानहानि होती है, राजभय होता है, धन नाश होता है, विष से या सर्प से या ज्वर से पीड़ा होती है और खेती और भूमि की हानि होती है।
यदि महादशानाथ से बृहस्पति केन्द्र-त्रिकोण में हों या 11वें भाव में हों और षड्बल से युक्त हों तो बंधुओं से और पुत्र से सुख होता है, उत्साह होता है, धन, पशु और यश की वृद्धि होती है और अन्न इत्यादि का दान करते हैं। आजकल पशुओं की जगह कारें आ गई हैं। यदि महादशानाथ से 6, 8, 12 में स्थित बृहस्पति निर्बल हो जाएं तो दु:ख, परेशानियां, रोग, भय, स्त्री और बंधु से द्वेष होता है, बहुत ज्यादा खर्चा होता है, राजकोप होता है, धन हानि होती है और ब्राह्मण से भय होता है। बृहस्पति यदि द्वितीयेश या सप्तमेश हों या दूसरे और सातवें भाव में हों तो कष्ट होता है।
बृहस्पति के दोषों के निवारण के लिए कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें।