1 लग्न एवं पंचम भाव में सूर्य , मंगल एवं शनि स्थित हो एवं अष्टम या द्वादश भाव में बृहस्पति, राहु से युति कर स्थित हो पितृशाप से संतान नही होती।

2 सूर्य को पिता का एवं बृहस्पति को पितरो का कारक माना जाता है। जब ये दोनो ग्रह निर्बल होकर शनि, राहु, केतु के पाप प्रभाव में हो तो पितृदोष होता है।

3  सूर्य, चंद्र एवं लग्नेश का राहु, केतु से संबंध होने पर पितृदोष होता है।

4 जन्मांग चक्र में सूर्य, शनि की राशि में हो एवं बृहस्पति वक्री होकर स्थित हो तो ऐसे जतक पितृदोष से पीड़ित रहते है।

5  राहु एवं केतु का संबंध पंचम भाव-भावेश से हो तो पितृदोष से संतान नही होती है।

6 अष्टमेश एवं द्वादशेश का संबंध सूर्य, बृहस्पति से हो तो पितृदोष होता है।

7  जब बृहस्पति एवं सूर्य नीच नवांश में स्थित होकर शनि, राहु, केतु से युति-दृष्टि संबंध बनाए तो पितृदोष होता है।

समय पर कुंडली का विश्लेषण करवा के उचित उपाय करके समस्या से छुटकारा पाये।