मित्रों हमारे मन में अक्सर ये जिज्ञाषा रहती है की हमे किसी ग्रह का पूर्ण रूप से फल कब मिलेगा| ज्योतिष में इसी के लिय दशाओं का वर्णन किया गया है जिसमे मह्रिषी पराशर जी द्वारा वर्णित विशोंतरी दशा को मुख्य रूप से महत्व दिया जाता है हालांकि हर ग्रह का गोचर के हिसाब से भी जातक पर हर समय प्रभाव रहता है लेकिन ग्रह का मुख्य प्रभाव उसकी दशा में मिलता है| अक्सर हम देखते है की किसी की कुंडली में कारक ग्रह काफी अच्छी सिथ्ती में होते है लेकिन फिर भी उसको उन ग्रह का लाभ नही मिल रहा होता है जिसका कारण ये होता है की उस जातक को वो दशा भुगतने का मौका ही नही मिला| या फिर ये भी देखा जाता है की किसी जातक के भाग्येश की दशा है और उसको कोई लाभ नही मिल रहा है जिसका कारक उस ग्रह की कुंडली में सिथ्ती होती है और उसी का वर्णन आज इस पोस्ट में कर रहा हूँ|
हमारी कुंडली में जिस भी ग्रह की दशा है उसके लिय सबसे पहले तो हमे ये देखने की आवश्यकता होती है की जिस ग्रह की दशा है वो कुंडली में कारक है या नही| यदिकोई ग्रह कारक है तो उसकी दशा में शुभ फल मिलने के योग बनते है| कारक ग्रह की ये खाशियत होती है की वो जिस भी भाव में विराजमान होता है और जिस भी भाव को देखता है उसके फलों में विरधी करता है|
उसके बाद हमे ग्रह की सिथ्ती देखनी होती है की ग्रह किस भाव में है और किस राशि में कितने अंश पर है| इस से हमे ग्रह के बल का पता चलता है | जैसे कोई ग्रह दिशा बलि है तो अपनी दशा में जातक को अपनी दिशा में ले जाकर सफलता के योग बनाता है| यदि कोई ग्रह स्थान बली है तो उस स्थान से सम्बन्धित पूर्ण फल जातक को देता है| यदि कोई ग्रह चेष्ठाबली है तो जातक के प्रयत्नों का जातक को पूरा फल देता है| यानी किसी बल के आधार पर उसके फल निर्भर करते है| साथ ही हमे ये देखना होता है की ग्रह की ईस्ट रश्मियाँ उसकी कस्ट रेशमी से अधिक है यानही और उसकी शुभ रेशमी उसकी अशुभ रेशमी से अधिक है या नही यानी इन सब बातों को ध्यान में रखकर यदि हम किसी ग्रह के फलको देखेंगे तो हम फल के बारे में काफी सटीकता से जान सकते है| यदि कोई ग्रह इन सब प्रिसिथियों से विपरीत सिथ्ती में हो या जैसे नीच अस्त शत्रु छेत्री आदि हो तो उसकी दशा में शुभ फल की आस कम ही कर सकते है| सबसे मुख्य बात है की ग्रह स्न्धिग्त तो नही है क्योंकि ऐसा माना गया है की उंच का ग्रह बलों से युक्त ग्रह यदि संधिगत हो तो अपना पूर्ण फल नही दे पाता|
कुंडली में मुख्य रूप से त्रिकोण भावों जैसे पहले पांचवें और नोवें भाव के मालिक ग्रह कारक होते है| उसके बाद केंद्र के ग्रह अपनी सिथ्ती के अनुसार कारकत्व प्राप्त करते है|
अब प्रश्न आता है की किसी भी ग्रह की दशा काफी लम्बी समय अवधि की होती है तो क्या वो हमेशा ही अपना शुभ अशुभ फल देगा ऐसा कदापि नही होगा| इसी समस्या के हल के लिय महादशा में अन्तर्दशा का प्रावधान रखा गया है| अन्तर्दशा के फल के अध्ययन के लिय महादशा नाथ और अन्तर्दशा नाथ केबिच क्या सम्बन्ध बन रहा है ये मुख्य रूप से प्रभाव डालता है| यदि किसी कारक ग्रह की दशा है और उस ग्रह की कुंडली में सिथ्ती से ऐसे ग्रह की दशा आती है जी महादशा नाथ से केंद्र यात्रिकोण में है तो दशा शुभ फल देती है लेकिन यदि ये दोनों ग्रह एक दुसरे से दुसरे बारवें या छटे आठवें भाव मेंहै तो इनकी दशा अशुभ फल देगी| साथ हीये बात भी मुख्य प्रभाव डालती है की पंचधा मत्री चक्र के अनुसार इनका सम्बन्ध मित्र या शत्रू आदि कैसा बन रहा है| इनदोनों ग्रहों में उस ग्रह का ज्यादा फल जातक को मिलेगा जो ज्यादा बली होगा|
कुंडलीमें सबसे बुरी दशा अस्ठ्म भाव के स्वामी की मानी गई है क्योंकि ये सबसे पापी ग्रह माना जाता है इसका कारण ये है की ये भाग्य भाव से बारवें यानी भाग्य के व्यय का भाव का स्वामी है और भाग्य का नाश हर किसी को नुक्सान देगा ये सर्वविदित है| हालांकि कुछ विशेष प्रिसिथितियों जैसे विपरीत राजयोग का निर्माण हो रहा हो तो अस्थ्मेश की दशा भी जातक को लाभ दे देती है|

मित्रों आपकी   कुंडली  के  ग्रह आपको  अपनी  दशा  अन्तर्दशा  में  अपना  शुभाशुभ फल  देते  है | मह्रिषी  पराशर  जी  द्वारा  रचित  लघु  पाराशरी का  मुख्य  उद्देश्य  ही  दशा  फल  का  वर्णन  करना  था  और  दशा  में  भी  उन्होंने  सबसे  ज्यादा  विशोंतरी  दशा  को  महत्व  दिया  है | दशा  में ग्रह  कैसा  फल  देंगे  उसके  कुछ  नियम  संछिप्त  में  आज   लिख  रहा  हूँ |
सबसे  पहले  तो  आपको  आपकी   कुंडली  के  योगकारक  ,  शुभ , अशुभ  और   मारक  ग्रह   की पहचान  करनी  होगी | इन  ग्रहों  के  अलग  अलग  करके  ग्रुप  बना  लीजिये |
इसके  बाद  ये  देखें  की  इनमे  से  किसका किसके  साथ सम्बन्ध बन रहा  है  यानी  की   जो  पहले  चार  सम्बन्ध बताये  थे  एक साथ   होना  या  एक  दुसरे   की  राशि   में होना  या  एक  दुसरे  को  पूर्ण   दृष्टी   से  देखना  या अपनी   राशि  में सिथत  ग्रह  को  राशि  मालिक   द्वारा  देखना  |
सबसे  पहला नियम  है  की  कोई  भी  ग्रह   अपनी  महादशा  में अपनी  ही   अन्तर्दशा  में अपना  विशेष फल  न  देकर  केवल  सामान्य  फल  देता है | यानी  यदि  कोई  योगकारक  ग्रह   की  महादशा  है   तो  अपनी योग  कारता का  फल  अपनी  अन्तर्दशा  में  नही  देगा  अन्तर्दशा  में  केवल  सामान्य  फल   देगा
  वो  ग्रह   अपना  फल  अपने  समान  फल देने  वाल्रे सम्बन्धी  ग्रह  की  अन्तर्दशा  में देगा  और  जातक  को  राजयोग  प्रदान  करेगा |
इसी प्रकार मारक   ग्रह  अपने  सम्बन्धी  मारक  ग्रह  की   अन्तर्दशा  में  अपना  सबसे  बुरा  फल   देगा |
योगकारक  ग्रह  में  जब  जब  अन्य  योगकारक  या  शुभ  या  अन्य  सम्बन्धित  ग्रहों  की   अन्तर्दशा  आएगी जातक  को  उत्तम  फल  देगी |
इसी  प्रकार   मारक  ग्रह   की  दशा में  जब  अन्य  मारक  ग्रह   या  अशुभ  ग्रह  या  अन्य  सम्बन्धी  ग्रहों   की  अन्तर्दशा  आएगी   जातक  को  बहुत  बुरा  फल  देगी |
इन  सभी  अनत्र्द्षाओं  में जो  सबसे  बड़ा  सम्बन्धी  और  समान  फल  देने  वाला  होगा उसमे  ही  कारक   या  मारक  ग्रह  का  सबसे  ज्यादा  फल  जातक  को  मिलगा |
महादशा  में  ऐसे  ग्रह   की  दशा  हो  जो   न   तो  सम्बन्धी  हो और  न  ही  महादशा  नाथ  के समान  फल  देने  वाला  हो   ऐसे  में  जातक  को  मध्यम  फल  मिलेंगे |
अपनी   महादशा में  अस्म्बन्धित  समान   फल  देने  वाले  ग्रह  की   अन्तर्दशा में पूर्ण   फल  जातक  को मिलेगे |
त्रिकोनेश  में केन्द्रेश  की  अन्तर्दशा  या   केन्द्रेश   में  त्रिकोनेश   की  अन्तर्दशा सम्बन्ध   होने  पर  अति  उत्तम  फल  देगी  और   सम्बन्ध   न  होने  पर  भी  अच्छा  फल  जातक  को  मिलेगा |
योगकारक  ग्रह   की  मह्द्षा  में  मारक   ग्रह   की  अंतरदशा  सम्बन्ध होने  पर  राजयोगकार्क  होगी }|
यदि  अन्तर्दशा  किसी सम्बन्धी   पाप  ग्रह   की  हो   तो   भी  कुछ  राजयोग  प्राप्ति  के  योग   बनेगे |
यदि  किसी ग्रह   को  कारकतव  और  मार्क्त्व दोनों  साथ  ही  प्राप्त  हो   तो   आरम्भ  में  शुभ  फल   और  दशा  के  अंत में अशुभ  फल  जातक को  मिलेंगे |
मह्द्षा  दशा  नाथ   से  अन्तर्दशा  का  स्वामी   यदि  केंद्र  या  त्रिकोण  में  हो  तो  भी   शुभ  फल  मिलते  है  यदि  दोनों में  6 8  का  सम्बन्ध  हो   तो  अशुभ  फल  मिलने  के  योग   बनते  है |
ग्रह  के  बली  यानी   की  उंच या  मूल  त्रिकोण  राशि  या  मित्र राशि  में   होने  पर  पूर्ण  फल  मिलते  है | अन्य  सिथतियों में  शुभ फलों  में कमी   हो   जाती  है |  ग्रह   के  डिग्री  के हिसाब   से  बली  होने  के  हिसाब   से  भी  फल  निर्भर  करते  है |
मित्रों ये आंशिक  रूप   से लिखने  की  कोशिस  की   है  ताकि आप  समझ  सको | विस्तार  से  एक  पोस्ट में लिखना  सम्भव  नही   है | बस  आप  अपनी कुंडली  के  ग्रहों  के  हिसाब   से  दशा  फल  का  अनुमान  लगा  सकते  है |
मित्रों दशा  फल  पर  मेरे  द्वारा  पहले  लिखी  हुई दो  पोस्ट  को  एक साथ  करके  आज  दोबारा  से  पोस्ट  कर  रहा  हूँ ताकि  हमारे  पेज  से जो  नये  मित्र जुड़े  है उनको  लाभ  मिल  सके |