श्राद्ध में कौऐ को भोजन क्यों कराते हैं?
श्राद्ध पक्ष में पितरों की पसंद का भोजन बनाकर उसका भोग लगाया जाता है। जैसा की सभी जानते हैं कि श्राद्ध पक्ष पितरों का उत्सव है इसलिए कई प्रकार के मिष्ठान बनाकर पितरों को उसका भोग लगाया जाता है।
पर क्या आप जानते हैं कि पितरों को भोजन अर्पित करने से पहले कौऐ को उसका भोग क्यों लगाया जाता है?
क्या कारण है कि श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही एकायक कौऐ की खोजबीन शुरू हो जाती है?
हिन्दू पुराणों ने कौऐ को देवपुत्र माना है। यह मान्यता है कि इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौऐ का रूप धारण किया था।
यह कथा त्रेता युग की है जब राम ने अवतार लिया और जयंत ने कौऐ का रूप धर कर सीता को घायल कर दिया था।
तब राम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी। जब उसने अपने किए की माफी मांगी तब राम ने उसे यह वरदान दिया की कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। बस तभी से श्राद्ध में कौओं को भोजन कराने की परंपरा चल पड़ी है।
दरअसल आपने गौर किया होगा कि कौआ काना यानि एक आंख वाला होता है। मतलब उसे एक ही आंख से दिखाई देता है। यहां
हिन्दू मान्यताओं में पितरों की तुलना कौऐ से की गई है।
जिस प्रकार कौआ एक आंख से ही सभी को निष्पक्ष व सम भाव से देखता है उसी प्रकार हम यह आशा करते हैं कि हमारे पितर भी हमें समभाव से देखते हुए हम पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें।
वे हमारी बुराईयों को भी उसी तरह स्वीकार करें जिस प्रकार अच्छाईयों को स्वीकारते हैं।
यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौऐ को ही पहले भोजन कराया जाता हैI
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