द्वितीय भाव व भावेश
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चूँकि दूसरा भाव धन का होने के साथ साथ मारक तथा कुटुम्ब भी है।
यदि चलित कुण्डली देखि जाए तो इसका कुछ हिस्सा लग्न में भी होता है। व्यक्ति जन्म लेते ही कुटुंब से जुड़ जाता है।
ठीक उसी तरह की व्यक्ति ने जन्म लिया और माँ ने पिता को थमा दिया।
इस भाव में भावेश स्वयं बैठे तो उसकी रूचि व इच्छा स्वार्थ की होती है। यदि ग्रह आत्मकारक हुआ तो साथ में राहू भी युति बनाए तो व्यक्ति नटवरलाल की तरह चालाक व स्वार्थसिद्ध होता है। हालांकि ऐसे लोग स्वनिर्मित तथा भौतिकता वादी होते है।
चूँकि यह इस भाव का कुछ हिस्सा लग्नगत भी होता है इसलिए इस भाव में बैठे क्रूर ग्रह बालारिष्ट योग की भी रचना होती है।
एक बात और इसमें अध्यन से पता चलता है कि इसका त्रिकोण का एक हिस्सा केन्द्रगत भी है।
वो है दशम भाव..
यदि दशमेश का इसे साथ मिल जाए तो राजयोग भी होता है। यदि यह स्वयं भी केंद्र में हो तो अच्छी स्तिथि का संकेत करता है।
द्वितीयेश यदि इस भाव में ही बैठे तो व्यक्ति दिन भर कुछ न कछू खाता ही रहता है। हालांकि पेटू नहीं होता है किसी दावत समारोह में व्यक्ति खाने के मामले में सबसे आगे ही रहता है। इसमें इसके लिए कोई संकोच नहीं होता है।
सप्तमेश का इस में होना दूसरी शादी का संकेत होता है। क्यूंकि यह भाव स्त्री धन भी है।
षष्ठेश का इस भाव में होना अच्छा नहीं है। व्यक्ति रोग, कर्ज का लें दें जमा पूंजी से ही करेगा..जो घातक है।
चतुर्थेश का इस भाव में होना माँ का सुख कमजोर होता है।
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